एक ऐसा डेली सोप जो पूरे के पूरे पैसे वसूल करा देगा ,जानें पूरी खबर

 मुझे वो दिन अब भी याद है जब किसी जमाने में दूरदर्शन पर हमलोग,बुनियाद और जिंदगी ये जो है जिंदगी जैसे डेली सोप आया करते थे जिनको देखकर लगता था कि ये हमारे बीच के लोगों के घर से जुड़ी कोई कहानी है।कहानियां वास्तविकता के धरातल पे हुआ करती थी पात्र जीवंत हुआ करते थे और उनका पहनावा और चाल ढाल ऐसी थी कि लगता था जैसे किसी आम आदमी की हो।उसके बाद फिर उदारीकरण का दौर क्या कि बस समझिये उधारीकरण हो गया।सर्वप्रथम शांति नामक डेली सोप दूरदर्शन पर क्या आरंभ हुआ बस उसके बाद ऐसी विकृत सोच परोसी जाने लगी की लोगों को इसी में मजा आने लगा।इसके साथ ही साथ एक स्वाभिमान नाम नाम का सीरियल भी आया जिसने झूठ और प्रपंच की पराकाष्ठा ही कर दी।



आज कितने ही वर्षों उपरांत एक ऐसा सीरियल सब टीवी पर शुरू हुआ जो उसी पुराने जमाने की परंपराओं का वाहक लगता है और जिसने अपने कामयाबी के ऐसे झंडे गाड़े कि बड़े से फिल्म अभिनेता निर्माता निर्देशक अपनी फिल्मों का प्रमोशन कराने तारक मेहता का उल्टा चश्मा के सेट पर आया करते हैं। पहली पहली बार मैंने जब इस डेली सोप को टीवी पर देखा तो बड़ा ही अजीब लगा।एक ही बात को पचास बार एक एक किरदार दोहराता है फिर सबका चेहरा प्रतिक्रिया में दिखाया जाता है।लेकिन कुछ दिन देखने के बाद इसका ऐसा चढ़ा की एक ही एपीसोड कितनी ही बार देख लो और नशा बढ़ता जाता है।मुझे याद है इसके पहले जो एक सीरियल दूरदर्शन पर आता था जिसका नाम'जिंदगी ये जो है जिंदगी'वो भी इसी प्रकार का हुआ करता था लेकिन वो इतने लम्बे समय तक नहींचला।तारक मेहता की सबसे खासियत यही है कि इसमें कुछ भी खास नहीं है।एक समाज में कुछ सुख हैं कुछ दुख जिसे पूरी गोकुल धाम सोसायटी आपस में साझा करती है।कहानी मुख्य रूप से जेठालाल के इर्द गिर्द घूमती रहती है जो कुछ कम पढ़ा लिखा व्यापारी है और हर रोज किसी न किसी मुसीबत में पड़ जाता है फिर उसकोमुसीबत से निकालने का काम करते हैं तारक मेहता जो पेशे से एक लेखक हैं और कहानी के अंत में वाचक का काम भी करते हैं।जेठालाल के पड़ोस में रहने वाले लोगों में भिड़े जो एक संस्कारी शिक्षक के साथ सोसायटी का सेक्रेटरी भी है जिसका उसे बड़ा गर्व भी है उसकी पत्नी माधवी जो अचार और पापड़ का व्यापार करती है।

इसके अलावा पड़ोसियों में मिस्टर अय्यर जो एक वैज्ञानिक है और उसकी पत्नी बबीता जी जिसका रहन सहन बड़ा ही आधुनिक है।जैसे ही इनका किरदार सामने आता है अह् ह्आ शब्द की ध्वनि बजती है और बड़ी ही मीठी सी हंसी इनके होठों पर बिखर जाती है।जेठालाल बस दीवाना है बबीता जी का और कोशिश में लगा रहता है कि कैसे इनके समीप आए ये और बात है कि अय्यर से छत्तीस का आकड़ा है।सभी किरदार चाहे सोढ़ी हो डाक्टर हाथी हो पत्रकार पोपट लाल हो या बाबूजी दया या फिरअब्दुल सब एक से बढ़कर एक।ऐसा लगता ही नहीं कि जैसे कोई अभिनय हो रहा है एक दम स्वाभाविक लगता है।कब समय निकल जाता है ऐहसास नहीं होता और हंसी के फव्वारे छूट पड़ते है।

दो करैक्टर जो इसमें स्पेशल हैं और कम ही आते हैं मुझे बड़ा ही लुभावने लगते हैं जिसमें पहला है बाघा और दूसरा लट्टू काका।ये दोनों जब कहानी में आते हैं कहानी को एक नयी ऊंचाई पर ले जाते हैं विशेषकर नट्टू काका।इनकी डायलॉग अदायगी और बॉडी लैंग्वेज इतनी मंझी हुई है कि पुराने जमाने के अशोक कुमार भी सामने खड़े हो जाय तो फीके पड़ जाय।जन्मजात अभिनेता लगते हैं। किरदारों के अलावा कहानी भी इतनी सुचारु ढंग से आगे बढ़ती है कि लगता है कहीं ब्रेक न आए।नहीं तो अब जो ट्रेंड चल रहा है डेली एपीसोड का हर एक कहानी में साजिश क्रोध प्रतिशोध हिंसा और अनाप शनाप काल्पनिक चरित्र जोड़ देते हैं।बेटा हो पिता हो या सास हो के बहू समझ ही नहीं आता कि उम्र दराज कौन है और कौन कमसिन।हर सीरियल में व्यभिचार अश्लील कपड़े संवादों की भरमार है।हर कहानी में किरदार करोड़ों का मालिक होगा आलीशान बंगला होगा और वो किसी न किसी हेराफेरी में लगा रहता है।

 ऐसे समय में कुछ देर तारक मेहता देख लीजिये तो दिन भर की थकान दूर हो जाती है थोड़ा ही सही स्वस्थ मनो-रंजन हो जाता है जो पूरा परिवार एक साथ बैठकर देख सकता है।मैं विश्वास के साथ कह सकता हूँ इतना अच्छी पटकथा उतना ही सुंदर निर्देशन और शैलेश लोधा जो सूत्रधार का पात्र निभा रहे हैं बहुत ही शानदार है।

Post a Comment

0 Comments