जीभ से जुड़े कुछ बेहद ही दिलचस्प फैक्टस,जानें इस बारे में

अगर आपको लगता है कि आपकी जीभ की कोई ख़ासियत नहीं है तो आप ग़लत हैं. जीभ शरीर का सबसे ज़्यादा इस्तेमाल होने वाला अंग है और फिर भी हम उसके बारे में न मात्र चीज़ें जानते हैं. लिए इसी बात पर पेश है जीभ से जुड़े कुछ दिलचस्प तथ्य जो शायद आपको आज से पहले न पता हो।
1. कितना बार ऐसा होता है कि हम कुछ खाते या बोलते समय अपनी जीभ धोख़े से काट लेते हैं. मगर चंद मिनटों बाद ही दर्द भी सही हो जाता है. ये सब हमारे मुंह में मौजूद टिश्यु और थूक की वजह से ऐसा होता हैं।
2. हमारी टांगों और हाथों की माशपेशियों की तरह हमारी जीभ कभी नहीं थकती जबकि हमारी जीभ दिनभर गति में रहती है. दरअसल, हमारी जीभ 8 मांसपेशियों से मिलकर बनी है, इसके साथ ही बेहद लचीली भी है. शायद इसलिए कभी हम खाने से नहीं थकते


3. हम सुनते आए है कि जीभ के अलग-अलग क्षेत्र हमें स्वाद का पता बताते हैं. लेकिन यह ग़लत है. दरअसल, जीभ के किसी भी हिस्से से स्वाद का पता लगाया जा सकता है. अलग हिस्से उस स्वाद की तीव्रता का पता लगाते हैं. वैसे, टेस्ट बड्स वास्तव में हमारे जीवन को बचाने का प्रकृति का एक तरीक़ा है, क्योंकि ये टेस्ट बड्स हमें खाने से पहले ख़राब या ज़हरीले भोजन की पहचान करने में मदद करते हैं।
4. अगर आप नाक बंद करके कोई टॉफ़ी खाएंगे तो आपकी जीभ केवल ये बता सकती है कि वो मीठी है. मगर आप ये नहीं बता सकते की वो चीज़ का स्वाद आख़िर में किस तरह है यानी चॉकलेट की तरह है या स्ट्रॉबेरी की तरह. इसका मतलब आपकी जीभ स्वाद में अंतर नहीं कर सकती है क्योंकि ये काम नाक का होता हैं।


5. जीभ का रंग और उस पर जमी परत कई बार बीमारियों के संकेत देती हैं. अगर गुलाबी है तो सब ठीक है. अगर लाल है ज़्यादा तो शायद कोई इंफ़ेक्शन हो गया है.पीला यानि पेट ख़राब या लिवर की कोई समस्या. सफ़ेद मतलब पानी की कमी.
6. आपकी उंगलियों के प्रिंट की तरह हर जीभ का भी अपना एक अलग प्रिंट होता है. यानी इसे पहचान के एक तरीक़े के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है. 
7. हमारी जीभ थकती नहीं है लेकिन आहार अपना वजन बढ़ता है तो जीभ का भी वजन बढ़ने लगता है. इसके अलावा, खर्राटे और नींद की समस्या एक मोटी जीभ होने की वजह हो सकती है।
8. क्या आप अपनी जीभ घुमा सकते हैं? वैज्ञानिक अभी भी खोज कर रहे हैं कि आख़िर क्यों आबादी का एक बड़ा प्रतिशत अपनी जीभ को 'U' आकार में कर सकता है बाक़ी नहीं. कई वैज्ञानिक का मानना है की ये जेनेटिक है तो कुछ का कहना कि हमारी बोलने वाली भाषा पर भी इसका असर पड़ता है।

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